पहचान “स्त्रीत्व” की
पहचान “स्त्रीत्व” की शायद मैं अच्छी माँ नही बन पायी…लेकीन मैंने कोशिश बहुत की थी. रसो॓ई,नाश्ता और घर के सारे काम निपटाकर फिर ऑफीस जाती थी आज भी ऑफीस की तैयारी में लगी थी..रोज सुबह की तरह मुझे जाना था.वक्त पे पहुंचना जरूरी था.. आसान नही था…बिल्कुल आसान नही था मेरे लिए नन्हे हाथोंमें पकडा मेरा आंचल कोमल उंगलींयोंसे छुडा लेना…वही मां का आंचल जो बेटी की ढाल होती है.. क्या मैं खुदगर्ज हो गयी थी! मैं रोज ममता की परीक्षा देती थी… “माँ ऽऽ मुझे भी ले चलो तुम्हारे साथ..” सुन रही थी मैं मेरी बेटी की रोने की आवाज… फिर भी ॲक्सिलेटर का स्पीड बढाकर स्कूटर से मैं चल पडी. मूडकर देेखने की हिम्मत नही थी मुझमें.. मैं कमजोर नही पडना चाहती थी.. कितनी बेरहम थी ना मैं? क्यू मैं नोकरी कर रही थी? पैसा कमाना जरूरी नही था…बिल्कूल नही…दहलीज के उस पार जाना इतना जरूरी था? फिर क्यू?...किस तरह सवालों के जवाब दू मैं?कैसे समझाऊं? पैसों से भी ऊपर होता है खुद का अस्तित्व! खुद की पहचान… मेरा वजूद… लेकीन अब….जब मैं दहलीज के इस पार बैठी हू.. उम्र के इस पडाव पर आज जब पीछे मूडकर देखती हूं एकही सवा...